मध्यप्रदेश के कटनी जिले में SIR ड्यूटी में लगे रोजगार सहायक ने आत्महत्या की खबर सामने आई है. परिजन ने बताया कि मृतक रोजगार सहायक की पेमेंट 3 माह से रुकी हुई थी. उन्होंने काम के दबाव में आकर फांसी लगा ली .
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ग्रामीण विकास योजनाओं में लगे रोजगार सहायक (Rojgar Sahayak) अक्सर गांवों के विकास, मनरेगा के कामों की निगरानी, रिपोर्टिंग और फील्ड विज़िट जैसे कई ज़िम्मेदार कामों को संभालते हैं। लेकिन इसी ज़िम्मेदारी के बीच जब व्यवस्था की लापरवाही किसी कर्मचारी की जान ले ले, तब यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सिस्टम की गंभीर खामियों का आईना भी बन जाती है।
हाल ही में SIR ड्यूटी (Social Impact Review / Social Inspection Report) में लगे एक रोजगार सहायक अधिकारी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने पूरे जिले और विभाग को हिलाकर रख दिया है। मृतक के पिता का आरोप है कि बेटे पर काम का अत्यधिक दबाव था और पिछले तीन महीनों से भुगतान भी नहीं किया गया, जिससे वह मानसिक तनाव में था।
यह घटना न केवल संवेदनशील है, बल्कि ग्रामीण प्रशासन के उस सच को भी उजागर करती है, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
घटना का विवरण: ड्यूटी के दौरान gayi जान
जानकारी के अनुसार, मृतक रोजगार सहायक अधिकारी हाल ही में विभाग द्वारा सौंपे गए SIR ड्यूटी में लगातार फील्ड पर लगा हुआ था। यह ड्यूटी समय-समय पर ग्रामीण विकास योजनाओं की प्रगति, सत्यापन और रिपोर्टिंग के लिए की जाती है।
परिवार का कहना है कि पिछले कुछ हफ्तों से वह दिन–रात काम में उलझा हुआ था। कई जगहों पर निरीक्षण, रिपोर्ट तैयार करना, ऑनलाइन अपलोडिंग और उच्च अधिकारियों की बार-बार आने वाली कॉल्स ने उसे शारीरिक व मानसिक तौर पर थका दिया था।
घर लौटने पर भी वह देर रात तक लैपटॉप पर रिपोर्ट पूरी करता था। पिता का कहना है कि उसने कई बार काम का दबाव कम करने या छुट्टी देने की बात रखी थी, लेकिन विभाग ने उस पर ध्यान नहीं दिया।
पिता का बड़ा आरोप — “3 महीने से वेतन नहीं मिला था”
मृतक के पिता ने मीडिया से बातचीत में बताया:
“मेरे बेटे को तीन महीने से भुगतान नहीं मिला था। घर का खर्च बढ़ रहा था, ऊपर से काम का बोझ अलग। वह तनाव में था और कहता था कि विभाग सिर्फ काम लेता है, लेकिन वेतन देने की बात पर कोई सुनवाई नहीं करता।”
भारत के कई राज्यों में पंचायत स्तर पर नौकरी कर रहे रोजगार सहायकों, पंचायती राज कर्मियों और मनरेगा स्टाफ के भुगतान में देरी कोई नई समस्या नहीं है।
कई कर्मचारी महीनों तक बिना वेतन काम करते रहते हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है। यही तनाव आगे चलकर मानसिक दबाव में बदल जाता है।
काम का बोझ: ग्रामीण स्तर पर कर्मचारी ‘वन-मैन आर्मी’ बन जाते हैं
रोजगार सहायक पर सामान्य तौर पर ये ज़िम्मेदारियाँ होती हैं—
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- मनरेगा कार्यस्थलों का निरीक्षण
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- जॉब कार्ड अपडेट करना
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- मजदूरों का भुगतान सुनिश्चित करना
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- योजनाओं की ऑनलाइन रिपोर्टिंग
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- विभागीय बैठकों में शामिल होना
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- विकास कार्यों की मॉनिटरिंग व फोटो अपलोड
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- पंचायत सचिव व उच्च अधिकारियों को दैनिक रिपोर्ट भेजना
SIR ड्यूटी होने पर ये कार्य दोगुने हो जाते हैं।
अक्सर ऐसा होता है कि एक-एक रोजगार सहायक को कई–कई पंचायतों का काम देखना पड़ता है।
उपर से अगर वेतन न मिले, तो स्थिति और भी तनावपूर्ण हो जाती है।
तंत्र की खामियां: कर्मचारियों की मानसिक स्थिति पर नहीं दिया जाता ध्यान
ग्रामीण स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी लगातार दबाव में काम करते हैं, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य, परामर्श, कार्य-भार प्रबंधन या भुगतान में सुधार जैसे विषयों पर विभाग पर्याप्त ध्यान नहीं देता।
कई राज्यों में जमीन पर काम करने वाले फील्ड कर्मियों की स्थिति इस प्रकार है—
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- कम स्टाफ
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- ज़्यादा काम
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- इंटरनेट/नेटवर्क की दिक्कतें
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- सिस्टम एरर और पोर्टल पर अपलोड का दबाव
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- वरिष्ठ अधिकारियों की लगातार रिपोर्टिंग के लिए कॉल
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- समय पर वेतन न मिलना
ये सभी कारण मिलकर व्यक्ति को मानसिक रूप से तोड़ देते हैं।
स्थानीय प्रशासन ने जांच के आदेश दिए
घटना के बाद स्थानीय प्रशासन की ओर से मामले की जांच शुरू कर दी गई है।
अधिकारी ये पता लगा रहे हैं कि—
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- क्या वास्तव में कर्मचारी पर अत्यधिक काम का दबाव था?
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- क्या कई महीनों से वेतन लंबित था?
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- क्या अधिकारी स्तर पर किसी ने अत्यधिक दबाव डाला?
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- उसकी ड्यूटी शेड्यूल और फील्ड विज़िट रिपोर्ट में क्या स्थितियां दर्शाई गई थीं?
यदि पिता द्वारा लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई की जा सकती है।
रोजगार सहायकों में नाराज़गी, सोशल मीडिया पर उठी आवाज़
घटना के बाद सोशल मीडिया पर कई रोजगार सहायकों ने अपनी नाराज़गी जाहिर की है।
उन्होंने कहा कि—
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- फील्ड स्टाफ पर काम का बोझ लगातार बढ़ रहा है
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- वेतन महीनों तक नहीं मिलता
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- अधिकारियों की मनमानी और दबाव के कारण कर्मचारी परेशान रहते हैं
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- कर्मचारियों के लिए सुरक्षा, प्रशिक्षण और वर्क-लोड प्रबंधन की व्यवस्था ज़रूरी है
कई संगठनों ने मृतक कर्मचारी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि सिस्टम की असफलता है।
क्या विभाग बदलेगा अपनी नीति?
यह सवाल अभी भी बना हुआ है।
कई बार ऐसी घटनाएँ सामने आने के बावजूद विभाग और प्रशासन स्तर पर कोई स्थायी समाधान नहीं होता।
जरूरी है कि—
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- फील्ड कर्मचारियों का वेतन समय पर मिले
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- SIR या किसी भी विशेष ड्यूटी में वर्क-लोड सीमित किया जाए
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- एक व्यक्ति को कई पंचायतों का ज़िम्मेदार न बनाया जाए
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- मानसिक स्वास्थ्य परामर्श की सुविधा दी जाए
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- वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अत्यधिक दबाव डालने पर सख्ती हो
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- कर्मचारियों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की जाए
अगर ऐसे कदम नहीं उठाए गए, तो इस तरह की घटनाएँ भविष्य में भी दोहराई जा सकती हैं।
परिवार और समाज के लिए एक बड़ा सबक
यह घटना हमें याद दिलाती है कि किसी भी कर्मचारी के पीछे एक परिवार होता है, जो उसके वेतन और सुरक्षा पर निर्भर करता है।
किसी की जान जाने के बाद जांच और कागजी कार्रवाई से व्यवस्था में सुधार नहीं आता।
सिस्टम को जिम्मेदारी से काम करना होगा और फील्ड कर्मचारियों की वास्तविक समस्याओं को समझना होगा।
निष्कर्ष
SIR ड्यूटी में लगे रोजगार सहायक की मौत केवल एक समाचार नहीं, बल्कि व्यवस्था की अनदेखी और कर्मचारियों के प्रति असंवेदनशीलता का गंभीर प्रतीक है।
पिता द्वारा लगाए गए आरोप—काम का बोझ और तीन महीनों से वेतन न मिलना—इस बात का संकेत हैं kai स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी किस हाल में काम करते हैं।
सरकार और विभाग के लिए यह सही समय है कि वे अपनी नीतियों और कार्यशैली की समीक्षा करें, ताकि भविष्य में किसी और परिवार को इस तरह की त्रासदी का सामना न करना पड़े।